शुक्रवार, 16 जून 2023

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

नोटबन्दी से बड़ी बेवकूफ़ी शायद ही कभी हुई होगी देश के इतिहास में ।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

केजू को झपाटे......?

इतने लोग चुनाव लड़ रहे हैं मगर, 

झपाटे सिर्फ़ केजरीवाल को ही पड़ रहे हैं। 

माजरा क्या है ? केजू ......

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

एक बार देख तो लो बंधुओं इनको जिताकर

उनको कईयों बार जिताए । 
क्या पाए ? क्या क्या पाए ? 
या पाए, वा ना पाए ?
अरे !
इनको भी इक बार जिता दो, 
वा पाओ, जो ना पाए !!

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

शोक, महाशोक और सुपरशोक

                  आज बहुत दिनों बाद अब क्या बात कर ली जाए ?   ऊब कर ब्लाग छोड़ दिया था। एक्सरसाइज़ करने और कराने में समय निकल गया। तैयारियाँ  ओलंपिक की करानी थी इन पहलवानों को, सो रात दिन आधुनिक अखाड़ों (जिम) में जमे रहे इन दुष्टों के साथ। बेचारे पसीना बहा कर कर तो बहुत पहुँचे हैं लंदन। सुशील वगैरह से उम्मीद तो है क्योंकि बहुत मेहनत करवा दी गई है। खैर अब जो कुछ है वो भगवान के हाथ है, मगर हमारे देश के खिलाड़ियों की वापसी खुशी के साथ होगी तो भला कौन आनंदित नहीं होगा ? एम आय राँग?

शोक :- 
पिछले दिनों थोड़े समय के लिये ब्लाग पर था तो मालुम पड़ा कि मेरे सबसे अजीज दोस्त, और भड़ास परिवार के सम्माननीय डा. रूपेश श्रीवास्तव का विगन ९ मई को आकस्मिक निधन हो गया। बहुत दुख हुआ यार। अरे मुझे तो उनसे लड़ते रहने में ही आनंद मिलता था। बल्कि मार्च के लास्ट वीक में मैं इंडिया में था तो मैंने उनसे मिलने तक का प्रोग्राम बना लिया था। फ़ोन किया तो हँस कर बोले कि "किलर भाई आप मिलो तो मुझसे हाथ जरूर मिलाना, मुझे देखना है कि मेरी उँगलियों के लिगामेंट कैसे रप्चर होते हैं ? मैंने कहा कि "अरे डा. साब मैं तो मजाक कर रहा था तो बोले मेरी नकल करते हुए "आय एम आलसो डूईंग द सेम"। दिवस भाई की किसी पोस्ट या शायद टिप्पणी और अविनाश वाचस्पति जी की पोस्ट से इस दुखद हादसे का पता चला। ऎसा तो कभी भी सोचा नहीं था। भगवान डा. साहब की आत्मा को शांति प्रदान करे। उनके बिना अब ब्लाग लिखने का मजा शायद ही आये। आय एम रियली मिसिंग हिम। रियली, रियली मिसिंग हिम फ़्रैण्ड्स।

महाशोक :-
अब दारा सिंह दादू को मैं याद न करूं, इज़ इट पॉसिबिल ? अरे पागल भर नहीं हुये ये समझ लीजिये। खूब रोये, खूब खूब रोये। मर्द को कभी दर्द नहीं होता। पर उस दिन हो गया। आय काण्ट बिलीव दैट ही इज़ नो मोर। बहुत कुछ लिखना था उनके बारे में मगर सब तो आप पढ़ चुके। और क्या बचा ? मेरे दादू और दारा दादू पक्के दोस्त थे। मेरे दादू के साथ उनकी फ़ाइट देखनी हो तो फ़िल्म लुटेरा में नाव पर हुई कुश्ती देख सकते हैं। माय दादू वास नोन एज़" काला दारासिंह" i.e. किलर दारासिंह विच वास चेन्ज्ड फ़रदर एज़ किलर झपाटा। 
मलखान, मंगोल, एल्डरमैन, फ़ोकस, जिस्टयार्ड, किंगकाँग, स्टोनक्रशर, पाईडपाईपर जैसे अनगिनत फ़्री स्टाइल पहलवानों की भीड़ में एक दारा सिंह दादू ही जो सिर्फ़ रुस्तमे-हिन्द ही नहीं रुस्तमे-ज़माँ (World Champion) थे और जिनके बारे में कहा गया कि
 "दारा जो कभी नहीं हारा"
आय काण्ट राइट मोर अबाउट हिम। परसों विन्दू भैया के घर पर बैठक होगी तभी रुलाई पेट भर कर होगी। संडे लंदन की फ़्लाइट। Alas!

सुपर शोक:-
अब ये भी कोई कम दादा तो थे नहीं, मगर कहलाते काका थे। अरे यार दीज़ फ़ेलोज़ आर नॉट सपोज़ टु डाय। इन जैसे लोगों का जाना अखर जाता है। बहुत अखर जाता है। प्लीज़ डोण्ट गो यू पीपुल। गॉड काइण्डली डोण्ट कॉल दैम। अरे अब क्या कहें ?  वो आँखें बंद करके खोल देना ही तो इनका सब कुछ था। राजेश खन्ना दादा (काका) तुसी क्यों चले गये ?  आनंद का गीत "ज़िंदगी कैसी है पहेली" बारंबार गूँजता है, आपके स्टारडम को सलाम आपके सुपरस्टारडम को सुपर सलाम। बी विथ अस इन अवर मेमोरी काका, बी विथ अस फ़ॉरएवर।  

 

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

किलर के एक ही झपाटे ने बड़े बड़े भड़ासियों को बनाया चिलरन

प्यारे पयारे ब्लॉगर बंधुओं,


ज़ील का झपाटे से प्रेम प्रसंग उजागर होने के बाद झपाटे से जलन रखने वालों की तादाद में भारी इजाफ़ा हुआ है। दिवस, मुनेन्द्र, दीनबन्धु, अमित, हिजड़ा झोलाछाप रुप्पू रूपेश इतिश्री वास्तव, हिजड़ा मनीषा, यूसलैस अनूप मंडल, और खरदूषण जैसे नामी गिरामी योद्धाओं ने किलर झपाटे पर नाना प्रकार के वार किये। मगर सबके सब भोथरे साबित हुए। इस महान पहलवान के किसी भी दाँव का उचित प्रत्युत्तर देने के बजाय इन्होंने उसे गूगल भर में खोजते रहने, कि ये कौन है ? कहाँ का है ? बड़े शहर का है ? छोटे शहर का है ? और उसकी शानदार अँग्रेजी पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहने के अलावा कोई तीर नहीं मारा। इंग्लिश में रूपेश एण्ड कम्पनी बहुत कमजोर समझ में आ रही है। क्या करें इन बेचारों के माँ-बाप ने पढ़ाने की कोशिशें तो बहुत की लेकिन इन महामूर्खों को वाहियात बातों से फ़ुरसत मिले तब ना। पहले एक एक जने मोर्चा संभालते रहे फिर बात न बनी और पिछ्वाड़े मार खा खा कर सूज गये तो सबके सब इकट्ठे चढ़ दौड़े झपाटे को अभिमन्यू समझ कर मगर गलती से वो भीम निकल गया। हा हा। अब इन लैंगिक विकलांग्स को भागते गली नहीं मिल रही भायखला की। हर तरह से पिटे झपाटे से और उसके सामने ये अपने मुँह मियाँ मिट्ठू भड़ासी, चिलरन (बच्चे) साबित हुए। झपाटे का नाम यू आर एल में डाल कर यहाँ वहाँ छ्द्म रूप से उल्टी सीधी टिप्पणियाँ करके जीत की खुशी मनाने वाले जल्द ही हैरत में पड़ेंगे जब कोई इनके नाम यू आर एल में डालकर  पूरे ब्लॉगजगत में अश्लील टिप्पणियाँ करके आ जायेगा। हा हा। आय विल नॉट बि रिस्पॉन्सिबिल फ़ार द कॉन्सीक्वेन्सेस दैन।
एक ही बात का दुख है यार मगर झपाटे को। वो ये कि भड़ास जैसे नामचीन ब्लॉग पर इन लैंगिक कम मानसिक विक्लांग्स का कब्जा है।


है है झड़ी हुई भड़ास।    

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

किलर झपाटे पर मर मिटी बेचारी दिव्या ज़ील

जी हाँ, फ़लानों और ढिकानों,

आप सबको अत्यंत दुख के साथ सूचित किया जाता है कि हमारे ब्लॉग-जगत की एकमात्र लौह महिला (जंग खाई हुई) डॉ. दिव्या ज़ील अपने सबसे प्रिय ब्लॉगर किलर झपाटे के प्यार में पागल होकर उन पर मर मिटीं और ब्लॉगजगत से इंतकाल फ़रमा गईं। यह समाचार ज़ील जी के ब्लॉग पर कल ही प्रकाशित हुआ था। खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई। श्रद्दांजलियों का ढेर लग गया है। बहुत दुख की बात है कि उनका दिल भी आया तो इस जुल्मी किलर झपाटे पर। दुष्ट कहीं का। ज़ील की मोहब्बत को समझ नहीं सका। ऐसे तो कई अन्य ब्लॉगरों ने भी ज़ील के दिल को जीतने की कोशिशें की थीं लेकिन वे सभी लौह महिला के शब्द प्रहारों को बरदाश्त न कर पाने के कारण उन्हें अपनी बहन बना बैठते थे। कोई दीदी तो कोई छोटी बहन। जबकि वे तो टेस्ट करने के लिये प्रहार करती थीं कि ये असली मर्द है भी कि नहीं ? च च च कोई ना मिला। चलिये कोई बात नहीं। इस चक्कर में ज़ील के पास नामरद भाइयों की फ़ौज तो तैयार हो ही गई। छोड़िये।
अब आप लोग तो सब कुछ जानते ही हैं ना कि स्त्री के दिल की थाह कोई पा सका है भला ? पाजी किलर झपाटा ! हाँ नहीं तो, वार पर वार सहता गया और वार पर वार करता भी गया। इतना भी ना समझ सका कि ऐसे में ज़ील के दिल में उसके जैसे जानदार मर्द के प्रति अचानक ही प्यार पनप जायेगा और  ..........हटाइये अब बात करके क्या फ़ायदा ? वो तो चली गईं कभी लौट कर ना आने के लिये। अब घूमते रहना बेट्टा झपाटे विरह में।  जब वो खाली झूले पर भूतनी बनकर तेरे घर में रात में रोज बारह बजे गाना गायेगी ना सफ़ेद साड़ी पहन कर, बीस साल बाद तक और उस समय तक अपनी प्यारी बहन के गम में झाड़फ़ूँक स्पै‍शलिस्ट झोलाछाप डॉक्टर रुपेश (इन्हें आदमीयों तक को बहन बनाने का शौक है क्योंकि ये भड़ास पर मुझे बहन जी बहनजी कह रहे हैं बार बार ज़ील की मौत के गम में)  जा चुके होंगे हम सब को छोड़कर, तब पूछेंगे कि देख लिया ना ज़ील के प्यार को ठुकराने का नतीजा ?

भगवान ज़ील की प्रीतात्मा (नॉट प्रेतात्मा अण्डर्स्टुड यू नॉटी ब्रदर्स ऑफ़ ज़ील) को शांति प्रदान करे और ............२ मिनट का मौन रखेंगे सब लोग।