मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

केजू को झपाटे......?

इतने लोग चुनाव लड़ रहे हैं मगर, 

झपाटे सिर्फ़ केजरीवाल को ही पड़ रहे हैं। 

माजरा क्या है ? केजू ......

शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

एक बार देख तो लो बंधुओं इनको जिताकर

उनको कईयों बार जिताए । 
क्या पाए ? क्या क्या पाए ? 
या पाए, वा ना पाए ?
अरे !
इनको भी इक बार जिता दो, 
वा पाओ, जो ना पाए !!

गुरुवार, 26 जुलाई 2012

शोक, महाशोक और सुपरशोक

                  आज बहुत दिनों बाद अब क्या बात कर ली जाए ?   ऊब कर ब्लाग छोड़ दिया था। एक्सरसाइज़ करने और कराने में समय निकल गया। तैयारियाँ  ओलंपिक की करानी थी इन पहलवानों को, सो रात दिन आधुनिक अखाड़ों (जिम) में जमे रहे इन दुष्टों के साथ। बेचारे पसीना बहा कर कर तो बहुत पहुँचे हैं लंदन। सुशील वगैरह से उम्मीद तो है क्योंकि बहुत मेहनत करवा दी गई है। खैर अब जो कुछ है वो भगवान के हाथ है, मगर हमारे देश के खिलाड़ियों की वापसी खुशी के साथ होगी तो भला कौन आनंदित नहीं होगा ? एम आय राँग?

शोक :- 
पिछले दिनों थोड़े समय के लिये ब्लाग पर था तो मालुम पड़ा कि मेरे सबसे अजीज दोस्त, और भड़ास परिवार के सम्माननीय डा. रूपेश श्रीवास्तव का विगन ९ मई को आकस्मिक निधन हो गया। बहुत दुख हुआ यार। अरे मुझे तो उनसे लड़ते रहने में ही आनंद मिलता था। बल्कि मार्च के लास्ट वीक में मैं इंडिया में था तो मैंने उनसे मिलने तक का प्रोग्राम बना लिया था। फ़ोन किया तो हँस कर बोले कि "किलर भाई आप मिलो तो मुझसे हाथ जरूर मिलाना, मुझे देखना है कि मेरी उँगलियों के लिगामेंट कैसे रप्चर होते हैं ? मैंने कहा कि "अरे डा. साब मैं तो मजाक कर रहा था तो बोले मेरी नकल करते हुए "आय एम आलसो डूईंग द सेम"। दिवस भाई की किसी पोस्ट या शायद टिप्पणी और अविनाश वाचस्पति जी की पोस्ट से इस दुखद हादसे का पता चला। ऎसा तो कभी भी सोचा नहीं था। भगवान डा. साहब की आत्मा को शांति प्रदान करे। उनके बिना अब ब्लाग लिखने का मजा शायद ही आये। आय एम रियली मिसिंग हिम। रियली, रियली मिसिंग हिम फ़्रैण्ड्स।

महाशोक :-
अब दारा सिंह दादू को मैं याद न करूं, इज़ इट पॉसिबिल ? अरे पागल भर नहीं हुये ये समझ लीजिये। खूब रोये, खूब खूब रोये। मर्द को कभी दर्द नहीं होता। पर उस दिन हो गया। आय काण्ट बिलीव दैट ही इज़ नो मोर। बहुत कुछ लिखना था उनके बारे में मगर सब तो आप पढ़ चुके। और क्या बचा ? मेरे दादू और दारा दादू पक्के दोस्त थे। मेरे दादू के साथ उनकी फ़ाइट देखनी हो तो फ़िल्म लुटेरा में नाव पर हुई कुश्ती देख सकते हैं। माय दादू वास नोन एज़" काला दारासिंह" i.e. किलर दारासिंह विच वास चेन्ज्ड फ़रदर एज़ किलर झपाटा। 
मलखान, मंगोल, एल्डरमैन, फ़ोकस, जिस्टयार्ड, किंगकाँग, स्टोनक्रशर, पाईडपाईपर जैसे अनगिनत फ़्री स्टाइल पहलवानों की भीड़ में एक दारा सिंह दादू ही जो सिर्फ़ रुस्तमे-हिन्द ही नहीं रुस्तमे-ज़माँ (World Champion) थे और जिनके बारे में कहा गया कि
 "दारा जो कभी नहीं हारा"
आय काण्ट राइट मोर अबाउट हिम। परसों विन्दू भैया के घर पर बैठक होगी तभी रुलाई पेट भर कर होगी। संडे लंदन की फ़्लाइट। Alas!

सुपर शोक:-
अब ये भी कोई कम दादा तो थे नहीं, मगर कहलाते काका थे। अरे यार दीज़ फ़ेलोज़ आर नॉट सपोज़ टु डाय। इन जैसे लोगों का जाना अखर जाता है। बहुत अखर जाता है। प्लीज़ डोण्ट गो यू पीपुल। गॉड काइण्डली डोण्ट कॉल दैम। अरे अब क्या कहें ?  वो आँखें बंद करके खोल देना ही तो इनका सब कुछ था। राजेश खन्ना दादा (काका) तुसी क्यों चले गये ?  आनंद का गीत "ज़िंदगी कैसी है पहेली" बारंबार गूँजता है, आपके स्टारडम को सलाम आपके सुपरस्टारडम को सुपर सलाम। बी विथ अस इन अवर मेमोरी काका, बी विथ अस फ़ॉरएवर।  

 

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

किलर के एक ही झपाटे ने बड़े बड़े भड़ासियों को बनाया चिलरन

प्यारे पयारे ब्लॉगर बंधुओं,


ज़ील का झपाटे से प्रेम प्रसंग उजागर होने के बाद झपाटे से जलन रखने वालों की तादाद में भारी इजाफ़ा हुआ है। दिवस, मुनेन्द्र, दीनबन्धु, अमित, हिजड़ा झोलाछाप रुप्पू रूपेश इतिश्री वास्तव, हिजड़ा मनीषा, यूसलैस अनूप मंडल, और खरदूषण जैसे नामी गिरामी योद्धाओं ने किलर झपाटे पर नाना प्रकार के वार किये। मगर सबके सब भोथरे साबित हुए। इस महान पहलवान के किसी भी दाँव का उचित प्रत्युत्तर देने के बजाय इन्होंने उसे गूगल भर में खोजते रहने, कि ये कौन है ? कहाँ का है ? बड़े शहर का है ? छोटे शहर का है ? और उसकी शानदार अँग्रेजी पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहने के अलावा कोई तीर नहीं मारा। इंग्लिश में रूपेश एण्ड कम्पनी बहुत कमजोर समझ में आ रही है। क्या करें इन बेचारों के माँ-बाप ने पढ़ाने की कोशिशें तो बहुत की लेकिन इन महामूर्खों को वाहियात बातों से फ़ुरसत मिले तब ना। पहले एक एक जने मोर्चा संभालते रहे फिर बात न बनी और पिछ्वाड़े मार खा खा कर सूज गये तो सबके सब इकट्ठे चढ़ दौड़े झपाटे को अभिमन्यू समझ कर मगर गलती से वो भीम निकल गया। हा हा। अब इन लैंगिक विकलांग्स को भागते गली नहीं मिल रही भायखला की। हर तरह से पिटे झपाटे से और उसके सामने ये अपने मुँह मियाँ मिट्ठू भड़ासी, चिलरन (बच्चे) साबित हुए। झपाटे का नाम यू आर एल में डाल कर यहाँ वहाँ छ्द्म रूप से उल्टी सीधी टिप्पणियाँ करके जीत की खुशी मनाने वाले जल्द ही हैरत में पड़ेंगे जब कोई इनके नाम यू आर एल में डालकर  पूरे ब्लॉगजगत में अश्लील टिप्पणियाँ करके आ जायेगा। हा हा। आय विल नॉट बि रिस्पॉन्सिबिल फ़ार द कॉन्सीक्वेन्सेस दैन।
एक ही बात का दुख है यार मगर झपाटे को। वो ये कि भड़ास जैसे नामचीन ब्लॉग पर इन लैंगिक कम मानसिक विक्लांग्स का कब्जा है।


है है झड़ी हुई भड़ास।    

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

किलर झपाटे पर मर मिटी बेचारी दिव्या ज़ील

जी हाँ, फ़लानों और ढिकानों,

आप सबको अत्यंत दुख के साथ सूचित किया जाता है कि हमारे ब्लॉग-जगत की एकमात्र लौह महिला (जंग खाई हुई) डॉ. दिव्या ज़ील अपने सबसे प्रिय ब्लॉगर किलर झपाटे के प्यार में पागल होकर उन पर मर मिटीं और ब्लॉगजगत से इंतकाल फ़रमा गईं। यह समाचार ज़ील जी के ब्लॉग पर कल ही प्रकाशित हुआ था। खबर जंगल में आग की तरह फ़ैल गई। श्रद्दांजलियों का ढेर लग गया है। बहुत दुख की बात है कि उनका दिल भी आया तो इस जुल्मी किलर झपाटे पर। दुष्ट कहीं का। ज़ील की मोहब्बत को समझ नहीं सका। ऐसे तो कई अन्य ब्लॉगरों ने भी ज़ील के दिल को जीतने की कोशिशें की थीं लेकिन वे सभी लौह महिला के शब्द प्रहारों को बरदाश्त न कर पाने के कारण उन्हें अपनी बहन बना बैठते थे। कोई दीदी तो कोई छोटी बहन। जबकि वे तो टेस्ट करने के लिये प्रहार करती थीं कि ये असली मर्द है भी कि नहीं ? च च च कोई ना मिला। चलिये कोई बात नहीं। इस चक्कर में ज़ील के पास नामरद भाइयों की फ़ौज तो तैयार हो ही गई। छोड़िये।
अब आप लोग तो सब कुछ जानते ही हैं ना कि स्त्री के दिल की थाह कोई पा सका है भला ? पाजी किलर झपाटा ! हाँ नहीं तो, वार पर वार सहता गया और वार पर वार करता भी गया। इतना भी ना समझ सका कि ऐसे में ज़ील के दिल में उसके जैसे जानदार मर्द के प्रति अचानक ही प्यार पनप जायेगा और  ..........हटाइये अब बात करके क्या फ़ायदा ? वो तो चली गईं कभी लौट कर ना आने के लिये। अब घूमते रहना बेट्टा झपाटे विरह में।  जब वो खाली झूले पर भूतनी बनकर तेरे घर में रात में रोज बारह बजे गाना गायेगी ना सफ़ेद साड़ी पहन कर, बीस साल बाद तक और उस समय तक अपनी प्यारी बहन के गम में झाड़फ़ूँक स्पै‍शलिस्ट झोलाछाप डॉक्टर रुपेश (इन्हें आदमीयों तक को बहन बनाने का शौक है क्योंकि ये भड़ास पर मुझे बहन जी बहनजी कह रहे हैं बार बार ज़ील की मौत के गम में)  जा चुके होंगे हम सब को छोड़कर, तब पूछेंगे कि देख लिया ना ज़ील के प्यार को ठुकराने का नतीजा ?

भगवान ज़ील की प्रीतात्मा (नॉट प्रेतात्मा अण्डर्स्टुड यू नॉटी ब्रदर्स ऑफ़ ज़ील) को शांति प्रदान करे और ............२ मिनट का मौन रखेंगे सब लोग।

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को कसाब और अफ़ज़ल गुरू के साथ ही फ़ाँसी पर लटकाया जाना चाहिए ?

इंसान को इंसान की हत्या का हक होना ही नहीं चाहिये। ये काम सिर्फ़ भगवान का ही है। प्रज्ञा ने एक तो क्षत्रिय होते हुए ब्राह्मणत्व का स्वाँग किया। दूजे उन्होंने मालेगाँव में बम ब्लास्ट को अंजाम दिया। ऐसा सकारी इल्जाम है। यदि वे षडयंत्र में शामिल थीं तब लॉ ऑफ़ द लैंड के तहत उन पर कार्यवाही होनी ही चाहिये अदरवाइज़ । मोरओवर अफ़ज़ल गुरू वगैरह जरा कॉम्प्लीकेटेड मैटर हैं। आम लोगों की समझ के परे। रही बात गोड़से  नथूराम की तो वो भाईसाहब द्वारा की गई ब्लंडर का नतीजा हिंदूवादीज़ आर स्टिल सफ़रिंग। यार नत्थू, तुमने गाँधी की जगह जिन्ना को क्यों नहीं मार दिया ? ससुरा पाकिस्तान का झंझट ही ना मचता। एम आय राँग ?

गाँधीजी वॉज़ बहुत महान। उनके बारे में ऊलजलूल विचार लिखकर उन्हें कभी भी अपमानित ना होने देंना चाहिये।
......एक बात और

माता भवानी की आड़ में हमें हिंसा का झाड़ लगाने की ना तो हिमाकत करनी चाहिए और ना ही उनके नाम से किसी को डराना चाहिये। ये बहुत ही गन्दी हैबिट कहलाती है। आपसी मतभेद बातचीत वैचारिक चर्चाओं के बीच में भगवान से इस तरह रिलेशन दर्शाना जैसे वो इन्हीं के रिश्तेदार हैं और सामने वाले का उनसे कोई रिलेशन ही नहीं है। हा हा, ऐसे लोग बुद्दू कहलाते हैं। ए दुनिया वालों क्रोध, खून जलाने से अलावा और कुछ नहीं कर सकता, नीचे खड़े सॉरी अण्डर्स्टुड ? एक एक (दिवस) कीमती है भाई। इसका (रूप) एक दूसरे से (zealsy) जलन- और वाकयुद्ध में नहीं बिगाड़ना चाहिये, आय थिंक। हर समय खोंखियाये साँड की तरह दुनिया भर को लाल कपड़ा समझ कर उस पर फ़ालतू में भड़ास नहीं निकालते रहना चाहिये। ये कुछ ब्लॉग टिप्स हैं जो मैने सोचा आप सभी से शेयर कर लूँ, आँग्लभाषा के फ़्यूज़न के साथ में। हा हा। जय जय झपाट। 

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

ज़ील (दिव्या) के ब्लॉग पर डरपोंक बनावटी देशभक्तों की कुश्ती ......किलर झपाटे के साथ


मेरे प्यारे दोस्तों,
आप सबको किलर झपाटे का सादर सप्रेम नमस्कार। आगे समाचार ये है कि परम आदरणीया मैडम दिव्या (ज़ील) के ब्लॉग पर पिछले दो दिनों से बहुत ही क्रोधी मगर अत्यंत डरपोंक किस्म के देशभक्त ब्लॉगरों का सम्मेलन चल रहा है। इनके ब्लॉग की ये विशेषता है कि यहाँ बहुत ही वाहियात किस्म के समसामयिक मुद्दे उठाए जाते हैं और उन पर एकतरफ़ा बहस ऑर्गेनाइज़ की जाती है। मजे की बात ये है कि, यदि आप इनके पक्ष में बोलें तो तत्काल आपकी टिप्पणी को तारीफ़ और प्रतिसाद मिलेगा। और यदि विपक्ष में बोलें तो लोग आपको ड्ण्डे मारने को तत्पर नजर आएंगे। बल्कि मारेंगे भी। अच्छा एक और बात है कि ये ज़ील मैडम जो कि दर‍असल एक मर्द हैं वे जबरन में औरत होने का स्वाँग रचे रहती हैं, ताकि लोगों पर अपने घड़ियाली आँसूओं का रौब डालकर उन्हें डरा सकें। अब गाहे बगाहे मैं भी अपने ब्लॉगरीय अधिकार के तहत इनके यहाँ चला गया और शिष्टाचारवश कोई टिप्प्णी कर दी तो समझिये कि बस हो गया हँगामा। मैं तो सबसे इज्जत से आप आप करके बात करता हूँ और इनके यहाँ के टिप्पणीकार मुझसे तू-तड़ाक करने लगते हैं। मैं उनकी बात का जवाब आप आप से ही देता हूँ, तो वे गाली गलौज तक करने लग जाते हैं। अब आप लोग तो जानते ही हैं कि मेरा तो दिल ही कुछ ऐसा है कि मैं किसी बात का बुरा नहीं मानता और रिप्लाई का रिप्लाई अदब के साथ देता ही जाता हूँ। उसमें ये मैडम ज़ील और उनकी टीम मुझसे इतना खुड़ जाते हैं कि मेरे बारे में खुद की टिप्पणीयाँ तो प्रकाशित करते जाते हैं और मेरा जवाब छापने पर इनकी हवा खिसक जाती है। एक कोई बहुत ही बड़े देशभक्त बेटे भी हैं भाई, मदर इंडिया बनी हुई जील मैडम के। अरे बापरे उनका गुस्सा नाक से बना है या नाक गुस्से से बनी है, यू काण्ट मेक आऊट। नाम है ईंजीनियर दिवस। मेरी बात का इन्हें जब कोई जवाब नहीं सूझता तो ये मगरमच्छ के आँसू बहुत सुन्दर ढंग से रोते हुए मम्मा ज़ील के पहलू में छुप जाते हैं और वहाँ से मॉडरेशन ऑन करवाकर उसकी आड़ में मुझे गरियाते हैं। गोइंग ग्रेट बेबी। और तो और जब इस पर भी बात नहीं बनती तो अचानक कहीं से डॉ. रूपेश श्रीवास्तव नामक सेक्स ब्लाईंड शख्स जो दर‍असल ज़ील ही हैं, मुझे ID वगैरह पहचानने की धमकी देते हुए बड़े ही दार्शनिक अंदाज में अपनी बेपेंदी की बकवास कर डरके मारे टिप्पणी मॉडरेशन के बिल में घुस जाते हैं। इनका नाम नए इतिहास में मॉडरेशन चूहा के नाम से मुतहरे अक्षरों में दर्ज किया जावेगा।
देखिए ज़ील के ब्लॉग पर मेरे साथ इस टिप्पणी घमासान के कुछ नमूने इसमें मेरी वे टिप्पणियाँ भी हैं जिन्हें इन भीरुओं ने भयवश छापने की हिम्मत ही नहीं दिखाई। हा हा। नाऊ एन्जाय योरसेल्फ़ मित्रों :-
Neeraj Rohilla said...
प्रशान्त भूषण ने जो भी कहा लोकतन्त्र के दायरे में रहकर कहा। उससे सहमत अथवा असहमत हुआ जा सकता है लेकिन केवल उस विचार से असहमति किसी को ये अधिकार नहीं देती कि आप खुले आम हिंसा पर उतर आयें। इस प्रकार की हिंसा की जिस प्रकार आपने अपने ब्लाग पर प्रशंसा की है चिंताजनक है। इस प्रकार की प्रवत्ति पर लगाम लगनी चाहिये, विरोध प्रकट करने के और भी तरीके हैं। आभार
Er. Diwas Dinesh Gaur said...
@नीरज रोहिल्ला
भाईसाहब कृपया उपदेश न दें, कोई और तरीका हो तो वह बताएं| हमे तो यही तरीका पता था सो इसका समर्थन करते हैं|
दूसरी बात, यदि कोई हमारे देश को तोड़ने की बात करे और हम चुपचाप सुनते रहें तो इससे बड़ी अनैतिकता क्या हो सकती है? क्या आपका यह वक्तव्य वीरता की श्रेणी में रखा जा सकता है?
जब स्वघोषित मसीहा टीम अन्ना का कोई सदस्य ऐसा बचकाना बयान देगा तो इसकी जिम्मेदारी अधिक होती है| जिसे उद्धारक समझा जा रहा है, जब वही देश तोड़ने की बात कहे तो बताइये जनता किस पर विश्वास करे? यह सरासर जनता के विश्वास पर वार है, इसकी सजा बहुत गंभीर होनी चाहिए|
मेरी पिछली टिपण्णी देखिये और बताइये कि क्या महारानाप्रताप भी गलत थे?
किलर झपाटा said...
प्रशांत-भूषण ने एकदम सही कहा है। आपको कुछ समझ वमझ में आता नहीं और लगीं हैं ऊटपटांग बातें करने। किसी को भी गद्दार वद्दार नहीं बोलना चाहिए एकदम से। दिस इज़ वैरी बैड ज़ील जी। और ये सबके सब ऊपर, जो आपके सुर में सुर मिला रहे हैं, गंदे विचारों वाले हैं ये लोग।
Er. Diwas Dinesh Gaur said...
@किलर झपाटा
भाई/बहन/Whatever, एक झपट्टा भूषण पर पड़ चूका है, इसे भूलना मत| देशद्रोही बयान देना तो गुनाह है ही, उसका समर्थन करना भी राष्ट्रद्रोह की श्रेणी में आता है| कश्मीर को भारत से अलग करने का बयान राष्ट्रद्रोही बयान है| इसमें क्या ठीक लगा आपको? क्या आप कश्मीर को भारत से तोडना चाहते है? यदि ऐसा है तो तू एक पाकिस्तानी है| हमारा देश क्यों सड़ा रहा है, जाकर घुस पाकिस्तान में|
अगर हमे समझ वमझ नहीं आता तो समझा दे| लेकिन देश को तोड़ने की बात मत कहना|
पहली बार मुखातिब होने का मौका मिला है| कितनी भी पहलवानी करता हो, बोलने से पहले सोच लेना चाहिए|
अभी के लिए इतना ही, आगे कुछ कहना हो तो इस परिपेक्ष्य को ध्यान में रख लेना|
किलर झपाटा said...
हमारा देश और इसके वासी मुग़ालता पालने में एकदम मास्टर हैं। भैया कश्मीर भारत का अभिन्न अंग बोलने भर से हो जाता है क्या ? ओय तथाकथित देशभक्तों। ये घर में चिटपिटी टिकली फोड़ने की जगह अनुच्छेद ३७० को तो पहले खत्म करा के बता दो। बात करते हो, हम राम सेना हैं हम फ़लानी सेना है। राम सेना के एक भी सैनिक के बराबर एक भी गुन नहीं है इन सभी में जो थपड़ा थपड़ी करते रहते हैं। जमानत होने के पहले जेल के बाहर और जेल में कितना पिटे होंगे जरा पूछ लेना उनसे। इनको कुन्दन कहते हैं आप और प्रशांत देशद्रोही। वाह वाह अच्छा डिफ़ाइन किए भैया। इसी किस्म की बेवकूफ़ियों ने देश को गुलाम बनाए रखा इतने दिनों। वोट डालते समय दोगे भ्रष्टों को और सच बोलने पर पीटोगे शिष्टों को। सुधार करना है तो इस किस्म की समस्याओं को जड़ से खत्म करने में दिमाग लगाओ। ये चनकटाई करने से कुछ बदलने वाला नहीं अण्डरस्टुड। जय हिन्द।
किलर झपाटा said...
जब जिन्ना, गाँधी, नेहरू, काँग्रेस और बरतानिया सरकार ने देश तोड़ा था, तब आपके दादा जी या नानाजी या और रिश्तेदारों ने क्या कर लिया था ? कुछ आप कर रहे हैं। चीन आँखें दिखा रहा है क्या कर पा रहे हैं, जरा बतलाइये तो ? मुझे पाकिस्तानी बतला रहे हैं आप। वैरी स्ट्रेंज। हा हा।  अभी आपकी हमारी मुलाकात नई नई है इंजीनियर साहब। जब ठीक से मिल लेंगे तब न चाहते हुए भी आप हमारे नियर आ जायेंगे। अरे ये पहलवान जब भी बोलता सोच-समझ कर ही बोलता है, मैन। बल्कि हम जो बोलता, पब्लिक उसी को सोचने लगता। एम आय राँग दोस्तों ? टैल दिस बेबी, दिवस। ही इज़ गैटिंग एंग्री ऑन मी !
shilpa mehta said...
@ किलर झपाटा जी
मैं आज दो तीन पोस्ट्स पर ( इसी विषय की ) एक ही बात लिख आई हूँ - कि जब प्रशांत भूषण जी स्वयं ही सब बातों के निर्णय "जनमत संग्रह" द्वारा ही कराना चाहते हैं - तो फिर उन्होंने जो कहा - उस पर उनके साथ अच्छा व्यवहार हो या बुरा - फूलों की मालाएं पहनाई जाएँ या जूतों की ? इस पर constitutional decision की ज़रुरत क्या है ?
जनमत संग्रह ही किया जाना चाहिए ना - कि उन जैसे बयान देने वालों के साथ क्या हो ? मुझे तो यही लगता है कि यदि ऐसा जनमत संग्रह किया जाए - तो उनके ही तरीके से उनका सही निर्णय हो जाएगा ... और यह कोई hung jury नहीं बल्कि clear cut रिजल्ट होगा - देख लीजियेगा !!!! किन्तु इसमें संविधान की आड़ ले कर छुपने का प्राविधान नहीं होना चाहिए !!! क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?

Er. Diwas Dinesh Gaur said...
@किलर झपाटा
कश्मीर में धारा ३७० लागू है, जिन्ना, नेहरु, गांधी, कांग्रेस, ब्रिटेन ने देश तोडा था, चीन आँखें दिखा रहा है तो क्या इसका मतलब यह हो गया कि जब तक यह सब ठीक नहीं हो जाता तब तक देश तोड़क बयानबाजी कर टाइम पास करें? ठीक है, इन सबके लिए लड़ना चाहिए, लेकिन यह क्या मतलब हुआ कि तब तक देश को तोड़ने वाले बयानों का समर्थन करलो और इनका विरोध करने वालों को बेवकूफ समझ लो?
कुछ अक्ल है या पहलवानी करके मोथा हुआ जा रहा है? या फिर अक्ल बेच कर मक्खन खा रहा है?
@ किलर झपाटा ,
तुम कौन हो क्या हो ये तो तुम ही जानो लेकिन एक बात तुम्हारी जानकारी के लिये बता दूँ कि किसी भी देश को राष्ट्र बनने की स्थिति तक आने और ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने में जितना समय लगता है उस लिहाज से पैंसठ साल तो शैशव काल है। हमारी सभ्यता हजारों साल पुरानी रही है उस सभ्यता और संस्कृति को संविधान तक लाने में समय लगेगा हम सब अपने अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं तुमने अब तक क्या क्या करा है गिनाओ ताकि हम तुम्हारा धन्यवाद कर सकें राष्ट्रहित में ।
संजय कटारनवरे
मुंबई
जय जय भड़ास
किलर झपाटा said...
आदरणीय शिल्पा जी,
हमको तो बहुत कुछ लगता है, पर लगता है कि इन तथाकथित देशभक्तों को कुछ भी नहीं लगता है। जिस संविधान की बात आप कर रही हैं क्या वो सबको मान्य था उन दिनों, और या के अभी भी ? कितने हिन्दू अम्बेडकर के हिन्दू कोड बिल के खिलाफ़ थे? कर क्या पाए ये अहम विषय है। सक्सेशन एक्ट में किए गए बराबरी के अधिकार ने भाई-बहनों को एक दूसरे के खिलाफ़ कोर्ट कचहरी करा दिया। ४९८/ए ने न जाने कितने निर्दोष जेल में पहुँचा दिए। काहे दिखावे का ये करवा चौथ हो रहा है, आय काण्ट अण्डरस्टैंड। उल्लुओं के मानिंद हजारों एक्ट बना के रखे हैं देश भर में। क्या सब के सब भ्रष्टाचार की जड़ नहीं हैं। सुगम क्यों नहीं बना पाते हम सब चीज़ों को ? अड़ंगों से दौड़ जीती गई है,कभी भला ?

और ये इंजीनियर दिवस दिनेश गौर जी,
नमस्ते सर। इनको सामने वाले से अदब से बात करना तक तो आता नहीं ये देशप्रेम करेंगे। डोनेशन देके प्रायवेट कालेज से पास होकर यही इंजीनियर तो पुल पे पुल गिरा रहे हैं और बात करते हैं अक्ल की। आप सुबह उठकर दैनिक कार्यों से फ़ारिग होकर थोड़ा भगवान के सामने ध्यान वगैरह किया कीजिए सर, ये बात बात पर सुलगना अपने आप कम हो जाएगा। हा हा। जरा इतिहास वितिहास अच्छे से समझना पढ़ना सीखो यार, क्या है ये, हैं ? अरे कुछ नहीं तो जिसको बहुत पसंद करते हो आप लोग वो क्या नाम है ? हाँ गोड़से नथुराम। उसकी ही लिखी पुस्तक पढ़ लो-- "गाँधीवध क्यों ?" सारे ज्ञानचक्षु खुल जावेंगे, भाई।

अरे हाँ ये मराठी भाऊ मिस्टर संजय कटारनवरे जी तो रह ही गए। आय हाय क्या बात है कटारपति! बहुत उम्दा। अरे भाऊ एतिहासिक गलतियाँ आजतक कभी सुधरी हैं भला ? रावण को हर साल जला जला के मार रहे हो और हर साल न जाने कितनी ही सीताएँ अगवा होकर अपनी इज्जत गँवा रही हैं। तब न इस राम सेना का कहीं पता होता है न बजरंग दल का। लाल बत्ती पर जब सिग्नल टूटता है तब भगतसिंह दल वहाँ से हमेशा नदारद रहता है। और हमने क्या किया पूछ रहे हैं ना तो एक बात समझ लीजिए यदि हर आदमी अपने आप को सुधार ले तो आपकी स्टाइल से समाज सुधार की जरूरत ही न पड़े। मैनें यह कभी नहीं कहा कि पीटने की नहीं बनती। बनती है भैया, मगर लकीर पीटने से क्या फ़ायदा। जड़ में पहुँचा जाए तो उपाय कारगर होगा बस इतना ही तो कहा। ब्लॉगर्स को छायावादी भाषा की समझ होना चाहिए। आप सब सिर्फ़ शाब्दिक अर्थ के उथले तैराक हैं। खैर, कोई बात नहीं सुधार की उम्मीद और दुआ के साथ आप सबको नमस्कार।

Er. Diwas Dinesh Gaur said...
@किलर झपाटा
मेरे सवालों का जवाब दिए बिना ऊट-पटांग टिपियाने से कोई फायदा नहीं|
देश में पचासों अनियमितताएं हैं, तो क्या किसी को देश तोड़क बयानबाजी करने की आज़ादी मिल जाती है? इससे बड़ी मुर्खता की बात और क्या हो सकती है? और तुझ जैसे लोग उनका समर्थन भी करते हैं|
सारे खोट उस युवक में ही क्यों नज़र आ रहे हैं, जिसने भूषण को पीता, क्या भूषण निर्दोष है?
साफ़ साफ़ बोल, क्या कश्मीर को भारत से अलग कर देना चाहिए? घुमा फिर कर उत्तर मत देना, जो कहना है क्लीयर कट कहना, जैसे मैंने कहा|  और हाँ तमीज केवल तमीज के हकदारों को ही मिलती है| अयोग्य व्यक्तियों को तमीज देकर मैं तमीज के साथ बदतमीजी नहीं कर सकता|  मेरी इंजीनियरिंग से तुझे इतनी जलन क्यों है? जो भी हूँ, आज अपने दम पर हूँ| किसी के बाप को एक फूटी कौड़ी नहीं खिलाई|
प्रतीक माहेश्वरी said...
तो आपके हिसाब से प्रशांत भूषण ने जो टिप्पणी कश्मीर पे की वो गैर-जिम्मेदाराना थी?
मैं तो यह कहता हूँ कि अब किस कश्मीर की लड़ाई चल रही है? उस सफ़ेद बरफ पर जमी हुई खून वाली कश्मीर?
या फिर आये दिन होने वाले विरोधों की कश्मीर?
अब वो इस धरती का स्वर्ग नहीं रहा.. खून-खराबा और लड़ाई जहाँ एक नियम बन चूका है उसके लिए किसी का भी लड़ना फिजूली है.. और प्रशांत भूषण की पिटाई हुई तो ठीक.. पर फिर ऐसे ही लोग दिग्विजय और उसके जैसे ही अन्य लोगों की पिटाई करने क्यों नहीं जाते हैं? तब इनकी हवा क्यों निकल जाती है.. सिर्फ और सिर्फ इसलिए क्योंकि दिग्विजय जैसे लोगों के हाथ में सत्ता है..
प्रशांत भूषण तो एक आम आदमी है जिसे कोई भी पीट सकता है राह चलते पर अगर सत्ता पर बैठे गद्दारों के साथ ऐसा सुलूक कोई करके दिखाए तभी उनके लिए मन में श्रद्धा उमड़ेगी अन्यथा वो आतंक फैलाने वालों की ही श्रेणी में गिने जाएंगे..
किलर झपाटा said...
@दिवस दिनेश गौर जी,
हा हा क्या बात है इंजीनियर साहब! कह रहे हैं "तमीज देकर मैं तमीज के साथ बदतमीजी नहीं कर सकता"। और करते बदतमीज़ी ही जा रहे हैं। वाह वाह ! जानी राजकुमार की पिक्चर देख लिए हैं क्या ? जो डायलॉग पर डायलॉग जड़ते जा रहे हैं। आपकी बात का जवाब तो प्रतीक माहेश्वरी जी ने १००% दे ही दिया। अब मेरे जवाब की जरूरत ही नहीं रही। रही बात उस युवक की तो इस तरह के लोग बिल्ली के गू होते हैं जो न लीपने में यूज़ किया जा सकता है न पोतने में। कम से कम इंजीनियर साहब, आप तो उनके जैसा बनने की कोशिश न करें। और आप कोई न्यूज़ चैनल वाले हैं, जो आपके सवालों का जवाब दूँ ? आप इंजीनियरिंग करके इतनी शान क्यों बघार रहे हैं, भाई ? आजकल तो हगे-पदे लोग भी इंजीनियर बन जाते हैं, हा हा। हगों-पदों से जलन रख कर क्या फ़ायदा ? आप तो खैर, ऐसे नहीं हैं, क्योंकि आपने किसी के बाप को फ़ूटी कौड़ी वगैरह खिलाई ही नहीं है, है कि नहीं ? गुड बॉय, खिलाना भी नहीं, क्योंकि भले ही आप मुझसे कितना भी लड़ें, मगर भ्रष्टाचार से लड़ने में तो आप प्रशांत-भूषण जी के साथ ही खड़े नजर आ रहे हैं, एम आय राँग? अरे हाँ और वो आपके "क्लीयर कट" पर बात करना तो भूल ही गए। अरे भैया, सब कुछ क्लीयर कट होने लगता ना, तो ये कश्मीर समस्या ही ना खड़ी होती। हा हा। चलिए आपसे एक क्लीयर कट सवाल पूछता हूँ। बिना घुमाए फिराए सिर्फ़ ‘हाँ’ या ‘ना’ में उत्तर दीजिएगा, ओ.के.।
“आपने अश्लील फ़िल्में देखना छोड़ दिया ”? हा हा।
गैट वैल सून इंजीनियर साहब।

ZEAL said...
@ नीरज रोहिला -
लोकतंत्र है भी हमारे देश में ? ज़रा सुनिश्चित कर लें पहले।
यहाँ शांतिपूर्ण तरीके से अनशन कर रहे , सोये हुए स्त्री पुरुषोंको आधी रात में लाठियों से मारा जाता है , क्या यही लोकतंत्र है ?
घोटालेबाजों पर महामहिम की चुप्पी ही लोकतंत्र है क्या ?
आतंकवादी देश के दामाद बने बैठे हैं और मासूम जनता निरपराध मर रही है , क्या यही लोकतंत्र है ?
कश्मीर हमारे देश का अभिन्न अंग है , उसके लिए अलगाववादी बयान क्या लोकतंत्र का हिस्सा है ?
भारत का खंडित करने वाले वक्तव्य क्या लोकतंत्र के हिस्से में आते हैं ?
यदि हर भारतीय ऐसे ही बयान देगा तो "देशप्रेम" की परिभाषा क्या होगी ? और देशद्रोही तथा अलगाववादी किसे कहा जाएगा ? पाकिस्तानी ओर हिन्दुस्तानी में फर्क क्या रह जाएगा भला ?
इस तरह की बयानबाजी करने वालों को ऐसी ही सजा मिलनी चाहिए तत्काल से, ताकि अन्य सर-उठाते देशद्रोहियों को वक़्त रहते सही शिक्षा मिल जाए।

ZEAL said...
@ और भी तरीके .....
किसी ने यह नहीं बताया की और भी कौन से तरीके हो सकते हैं ? नपुंसकों की जमात यूँ भी ज्यादा है , तभी तो हमारा देश आजाद होते हुए भी गुलाम है।

ZEAL said...
@ JC जी ,
कैंसर जब प्रारम्भिक अवस्था में हो तभी उसका conservative treatment संभव है। स्थिति बिगड़ने पर व्याधिग्रस्त अंग को काट कर फेंक देना ही एक मात्र इलाज है , अन्यथा रोग हड्डियों तक पहुँच जाता है और मृत्यु अवश्यम्भावी है। अतः नासूर के बढ़ने से पहले ही उसे नष्ट कर देना चाहिए।
आज एक भूषण हैं , कर को दस हो जायेंगे , अतः ऐसे लोगों की पिटाई उचित है , ताकि लोग देशद्रोही बयान देने से पहले सौ बार सोचें।  गुनाहगार खुले घुमते हैं तो अन्य दुष्टों को भी दुष्टता करने के लिए बल मिलता है।
अतः शठे शाठ्ये समाचरेत ! ( ऐसा श्रीकृष्ण का उपदेश है )
कल करवाचौथ का उपवास था , पारिवारिक तथा सामाजिक दायित्वों की व्यस्तता के कारण अंतरजाल पर नहीं आ सकी , अतः आपके प्रश्न का उत्तर देने में विलम्ब हुआ। करबद्ध क्षमाप्राथी हूँ।

ZEAL said...
@ किलर झपाटा-
आपने लिखा मुझे ज़रा भी समझ नहीं है और ऊटपटांग लिखती हूँ।
क्या आप नासमझों के ही ब्लौग पर दर्शन देते हैं ? अथवा कोई और कारण है मुझ पर इतनी कृपा करने की ?
आपको चेतावनी दी जाती है की मेरे आलेख पर आये टिप्पणीकारों का अपमान करने की गुस्ताखी न करें। आपकी अन्य ID भी जानती हूँ। आपने अपने दोनों ID से यहाँ टिप्पणी कर रखी है।
आप कौन हैं , यह कोई जाने या न जाने लेकिन मैं पिछले एक वर्ष से जानती हूँ हूँ, जबसे आपने मेरे खिलाफ आलेख लिखकर भाड़े के टट्टुओं द्वारा मुझे बदनाम करने की कुचेष्टा की थी।
ऐसी कुचेष्टा बहुत से अज्ञानी स्त्री एवं पुरुष ब्लॉगर कर चुके हैं। जब अंगूर अप्राप्य हो जाते हैं तो लोग इसी ही कुचेष्टा करते हैं। आप का दिल यदि न भरा हो तो पुनः एक आलेख लिख दें , अब आपको और भी ज्यादा बदबूदार टिप्पणियां मिलेंगीं, क्यूंकि मुझसे द्वेष रखने वालों की बढ़ गयी है, जिसका लाभ आप ले सकते हैं।
द्वेष रखना आसान काम है , जो उथले लोग ही करते हैं। प्यार तो सिर्फ दिलदार ही करते हैं , सबके बस की बात नहीं।

ZEAL said...
@ किलर झपाटा-
आप दिवस के पीछे हाथ धोकर न पड़ें। वह एक देशभक्त युवा है। आपको व्यक्तिगत आक्षेप लगाने हों तो कहीं और जाइए । मेरे ही आलेख पर मेरे होनहार बेटे का अपमान करने की कुचेष्टा मत कीजिये।
गर्व है मुझे दिवस पर , हर माँ को गर्व होता है ऐसे बेटे पाने पर। गर्व है भारतमाता को अपने देशभक्त बेटों पर जिन खून में उबाल तो आता है । अन्यथा तो आजकल लोगों का रक्त जमा हुआ ही होता है।
रही बात उनके अहंकार करने कि, कि वे इंजीयर हैं , तो अवश्य करनी चाहिए। अपनी शिक्षा पर गर्व करना ही चाहिए। मुझे भी गर्व है दिवस कि शिक्षा पर ।  दिवस मेरा होनहार इंजिनियर-ब्लॉगर-देशभक्त बेटा है। आज ऐसे ही बेटों कि ज़रुरत है भारत माता को।

डा.रूपेश श्रीवास्तव(Dr.Rupesh Shrivastava) said...
सीधी बात कर रहा हूँ किलर झपाटा नाम के प्राणी से-
भाई/बहन/लैंगिक विकलाँग क्या हो इसलिये संबोधन में कदाचित अड़चन न हो अन्यथा न लीजिये। संजय कटारनवरे ने जो भी लिखा उसे दोहराने की जरूरत नहीं है। आपने ये अनुमान कैसे लगा लिया कि कौन बिल्ली का गू है और बाकी लोग किस तरह के मल पदार्थ हैं। हम तो कभी समाज के सुधार की बात ही नहीं करते हम खुद सुगंधित हो जाएं आसपास की दुर्गंध स्वतः ही हल्की होने लगेगी। एक बात स्पष्ट बता दूँ कि हम लोग जीवन को ऑनलाइन ही नहीं बल्कि ऑफ़लाइन भी इसी अंदाज में जीते हैं। जीवन ब्लॉगिंग या कमेंट्स तक सीमित नहीं है, प्यार से गले लगाने और घूँसे से मुँह तोड़ देना भी तो है हमारे लिये, जहाँ जो मुद्रा चलती हो वो सिक्का निकाल लेते हैं। आप चाहें तो मेरी मेडिकल की उपाधि एम.डी. और पी.एच.डी. पर भी सवालिया निशान लगा सकते हैं। आप ४९८ ए के लिये परेशान हैं और हमारे कुछ परिचित १२४ ए के बारे में संघर्ष कर रहे हैं सबका अपना अपना महाभारत सजा हुआ है क्योंकि सबका आदर्शवाद भिन्न है। आपने नाथूराम गोडसे की बात कही है तो बस इतना बता दीजिये कि आपके दर्शन के अनुसार राष्ट्रवाद(मैं महाराष्ट्रवाद की बात नहीं कर रहा) क्या है। एतिहासिक गलतियाँ सुधारी जाने की प्रक्रिया इतनी धीमी होती है कि आप उसे शायद महसूस नहीं कर पा रहे हैं और हमें श्रीराम सेना या बजरंग दल या किसी फासीवादी सोच से उपजा मानने का दुराग्रह पाल बैठे हैं।
आप साफ़ तौर पर बताइये कि क्या आप वोट करते हैं?
यदि हाँ तो किस आधार पर? यदि ना तो कारण साफ़ करें??
आप लोकतंत्र और भारत के मौजूदा संविधान के बारे में क्या विचार रखते हैं, आपकी सोच में “विधि का शासन” क्या महत्त्व रखता है?
क्या आपकी जड़ें बरतानिया से जुड़ी हैं या अमेरिका से जो बीच-बीच में आप देवनागरी में आंग्लभाषा में विचार व्यक्त करने लगते हैं?
क्या आप मुझसे इतिहास(भारत एवं विश्व), भारत का समाज और समाज शास्त्र, विधि शास्त्र, अपराध शास्त्र, राजनीति विज्ञान, मनोविज्ञान, दर्शन शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, भाषा विज्ञान में से क्या किसी विषय पर शास्त्रार्थ करना चाहते हैं संभव है कि कुछ रचनात्मक निर्णय निकल आए?
ब्लॉगिंग करने वाले शाब्दिक तालाब में तैरने वाले लोग हैं या विचारों के समुद्र में गहरे गोता लगा कर मोती चुन कर लाने वाले इसका निर्णय आप कैसे लेते हैं, कुछ तो पैमाना होगा आपके पास तो अगली टिप्पणी में हमारे साथ बाँटना चाहेंगे?
क्या आप अश्लील फिल्में बनाते हैं?
आप या प्रतीक माहेश्वरी जी कब और कितनी बार काश्मीर होकर आए हैं ये बताएं तो इस विषय पर अवश्य बात करेंगे?
Jएक बात बतानी थी कि संजय कटारनवरे मराठी नहीं जन्मना हिंदीभाषी हैं लेकिन उनके पूर्वज महाराष्ट्र से थे
हम पीटते हैं लेकिन लकीर नहीं जो लकीरें बना रहा है उसे समझने का प्रयास करते हैं कि लकीरें रचनात्मक हैं या ध्वंसात्मक, उसके बाद बनी लकीरों को संवारने का जतन कर रहे हैं; आप भी योगदान करें। आत्मकेन्द्रित रह कर आत्ममुग्धता में लीन रहना समाज से अलग कर देता है। निःसंदेह आप मानव हैं तो सामाजिक होंगे ही यदि न हो तो भी आपका नैतिक दायित्व है मानना न मानना आपका निर्णय होगा लेकिन विचार अवश्य करिये।
हृदय से प्रेम सहित
डॉ.रूपेश श्रीवास्तव

Er. Diwas Dinesh Gaur said...
@किलर झपाटा
तेरी घटिया टिप्पणियों में ही तेरी घटिया सोच दिखाई दे रही है| अगर तू अश्लीलता से ऊपर उठकर कुछ सोच पाता तभी तुझे राष्ट्रवाद का कुछ आभास होता| मेरे सवाल का जवाब देने की तेरी औकात नहीं है| अश्लील फ़िल्में तू ही देख और करता रह वैचारिक हस्त मैथुन|
October 16, 2011 4:30 PM

Er. Diwas Dinesh Gaur said...
दिव्या दीदी
मेरे पास शब्द नहीं हैं| आप समझ सकती हैं, मैं क्या कहना चाहता हूँ|
आपने मुझमे जो विश्वास दिखाया है, उसे बनाए रखूंगा| निश्चित रूप से आप मेरी बड़ी बहन ही नहीं, मेरी माँ भी हैं| मुझे गर्व है मेरी माँ पर जो समाज के साथ साथ ब्लॉगजगत में फैली अनियमितताओं के खिलाफ भी लडती है| ब्लॉग भी तो समाज का ही एक हिस्सा है| यहाँ आपका लोहा अब सभी को मानना पड़ रहा है|
कितने ही मूर्खों ने आप पर आक्रमण किया, और स्वयं को मर्द समझ रहे थे| ऐसी परिस्थितियों में भी आपका लौहत्व नहीं डगमगाया| दुःख तो तब हुआ जब इन तथाकथित मर्दों की जी हुजूरी कुछ महिलाएं भी कर रही थीं जो आज तक जारी है| ऐसी महिलाओं पर समय क्या बर्बाद करना|

झपाटे टाइप प्राणी गली गली भौंकते दिखाई दे जाते हैं| इनमे और दिग्गी में अधिक अंतर नहीं है| इनकी बेहूदगी तो देखिये, अश्लीलता पर भी आ गए| फिर भी इनके लिए "झपाटा जी" जैसे सम्मान सूचक शब्दों का उपयोग दुःख दे रहा है| जो व्यक्ति हमारे देश को तोड़ने की बात कर रहा है उसे सम्मान मिल रहा है और कहते हैं "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता"
कल यही आदमी माताओं और बहनों से दुकर्म की इच्छा जाहिर करेगा (अब इसकी नीयत तो इसकी टिप्पणियों में ही दिखाई दे जाती है, जब यह अश्लील फिल्मों के सवाल पूछ रहा है) तो क्या इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानकर सम्मानित किया जाएगा? इसमें और भूषण में फर्क ही क्या है?
खैर, इनका भी इलाज हो जाएगा|

आप इसी प्रकार अपना आशीर्वाद, प्रेम व विश्वास बनाए रखें|
आपका बेटा
दिवस


आदरणीय ज़ील मैडम,
वैसे तो मेरा आपसे वाकयुद्ध का कोई इरादा नहीं था, पर अब आप समर में उतर ही पड़ी हैं तो ठीक है। टिप्पणियाँ करने और पाने में क्रोध का स्थान नहीं होना चाहिए और सामने वाले को घड़ी-घड़ी उसकी ID बताने की धमकी देने वालों को मैं कायर समझता हूँ। ये सुविधाएँ ब्लॉग पर इसीलिए हैं कि अपनी बात निसंक्कोच रखी जा सके। अब आप लोग मेरी बात का जवाब दे नहीं पाते तो मैं क्या कर सकता हूँ जी ? वाह वाह आप स्व्यंभू भारत-माता और दिवस आपके देशभक्त बेटे ! क्या कहना ! और आपको बदनाम करने की कुचेष्टा करने की जरूरत ही क्या है जब आप खुद-बखुद अपनी बेहतरीन हरकतों की वजह से .......अब हटाइये भी। मैं बोलूँगा तो बोलोगे कि बोलता है। हा हा।
और मैडम सुनिए, मेरी हर टिप्पणी की भाषा जरा लैंस लगाकर पढ़ा कीजिए। मैं कतई अपमान-जनक बात किसी के लिए कभी करता नहीं। वो आपके तथाकथित बेटे (इंजीनियर साहब) ने मुझसे किस तरह बात की, पढ़ लीजिए। बाद इसके मुझे कुछ कहें। जब मेरी आपकी बात हो रही थी तो उन्हें भनभनाने की क्या जरूरत थी भला ? अब हैंडवाश डे पर झपाटा को छेड़ोगे भाई, तो वो तो हाथ धोकर पीछे पड़ेगा ही। हा हा। पुराना सफ़ाई-पसंद है ना। चूँकि आपने आदेश दिया है और आपकी बहुत इच्छा है तो ठीक है, अपने ब्लॉग पर इस वाकयुद्ध प्रकरण पर लेख लिख दुँगा। दे दीजिएगा अपनी पलटन के साथ मुझे उसी तरह हजारों गालियाँ। धन्यवाद।

वाह वाह रूपेश जी,
क्या सीधी बात की है आपने मुझसे। मगर भैया पहले मेरी इसके पूर्व की गई टिप्पणियाँ तो छाप लीजिए फिर आगे बात करिएगा। सयाना कौवा हमेशा गू (आपकी भाषा में मल) पर ही बैठता है और आप भी जल्दबाजी में वही कर बैठे हैं मुझ पर टिप्पणी करके। राज़ खुलने वाला है आपका। प्लीज़ डोण्ट माइंड। आप लोग इतने डरपोक क्यों हैं जो सवाल तो करते है जवाब के वक्त मॉडरेशन चालू कर लेते हैं। मुश्किल है ऐसे में प्रमोशन आपका।

इंजीनियर दिवस साहब,
मैंने आपसे सिर्फ़ हाँ या ना में जवाब पूछा था वो तो आप दे नहीं पाए। हार मान लीजिए भाई। ये मॉडरेशन लगाकर होशियारी दिखाने से थोड़ी जीत जाओगे। हा हा।  अच्छा ! तो आप अश्लील फ़िल्में देख देख कर वैचारिक हस्त मैथुन भी करते हैं। वैरी स्ट्रेंज। गन्दी बात है ये। आपके हितैषी वो आयुर्वेदाचार्य डॉ. रूपेश श्रीवास्तव जी (ज़ील के नाम से दुनिया को बेवकूफ़ बनाने वाले) ने नहीं बतलाया कि इससे शारिरिक कमजोरी आ जाती है। बतलाइए अब आपको तो मानसिक कमजोरी तक आ गई है। इसीलिए तो कहते हैं कि मन में कुत्सित विचारों को स्थान नहीं देना चाहिए। क्रोध वगैरह करना छोड़िए और टिप्पणी मॉडरेशन से बचे रहिए। आप भी जल्द उबर जाएंगे ऐसी परेशानियों से। भगवान आपको सदगति ओ सॉरी सदबुद्धि दे। धन्यवाद।